नई दिल्ली ।

सदियों पहले उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नालंदा यूनिवर्सिटी का बड़ा नाम था। भारत इसे दोबारा खड़ा करने की कोशिशों में लगा है, लेकिन भारत से पहले चीन ने अपने यहां इसकी शुरुआत कर दी है। चीन ने मॉन्क यीन शुंग को यूनिवर्सिटी का डीन बनाया है। फिलहाल विश्वविद्यालय का नाम ननहाई बुद्धिस्ट कॉलेज है। इसका मकसद बुद्ध धर्म, दर्शन, वास्तुकला के क्षेत्र में शोध व अनुसंधान को बढ़ावा देना है। 



नालंदा यूनिवर्सिटी की तर्ज पर चीन में ननहाई बुद्धिस्ट कॉलेज बनाया  गया है। समुद्र के किनारे नानशान पहाड़ पर स्थित यह कॉलेज 618.8 एकड़ में फैला है। यह कॉलेज जिस समुद्र तट पर स्थित है, उसे ब्रह्मा की पवित्र भूमि का नाम दिया गया है। 



इसका कॉन्सेप्ट योग वशिष्ठ व महायान बौद्ध धर्म से मिलता-जुलता है। इस कॉलेज में बौद्ध धर्म, तिब्बती बौद्ध धर्म, बौद्ध वास्तुकला डिजाइन व अनुसंधान संस्थान समेत 6 विभाग होंगे। इस कॉलेज में तीन भाषा पाली, तिब्बती व चीनी भाषा में पढ़ाई होगी। इसकी तैयारी पूरी हो चुकी है और सितंबर से इस कॉलेज में इसके पहले बैच की पढ़ाई शुरू हो जाएगी,  जिसमें कुल 220 छात्र होंगे।



भारत 10 वर्षों से है प्रयासरत

2006 में बिहार में नालंदा विवि फिर से स्थापित करने का आइडिया चीन ने ही भारत को दिया था। 455 एकड़ में बनने वाले नालंदा विवि कैम्पस को बनाने की भारत की प्लानिंग अब तक पूरी नहीं हो सकी है। 2007 में संस्थान बनाने व शुरू करने के लिए मेंटर्स की एक टीम बनाई गई। लेकिन यहां अभी तक प्लानिंग ही चल रही है। इस टीम में नोबल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन जैसे दिग्गजों को शामिल किया गया। दुनिया की सबसे प्राचीन रेजिडेंशियल यूनिवर्सिटी में से एक नालंदा विवि में समग्र पाठ्यक्रम था और यहां पढऩे के लिए लोग दुनियाभर से आते थे।



सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी 

दुनिया की सबसे पुरानी विश्वविद्यालय है नालंदा। इसके अवशेषों की खोज अलेक्सजेंडर कनिघंम ने की थी। इसकी स्थापना 450 ई. में गुप्त वंश के शासक कुमार गुप्त ने की थी। 1193 में विदेशी आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने इस विश्वविद्यालय को तहस-नहस कर जला डाला था। भगवान बुद्ध भी यहां आए थे। पांचवीं से 12वीं शताब्दी तक बौद्ध शिक्षा केंद्र के रूप में यह विश्वप्रसिद्ध रहा। यह दुनिया का पहला आवासीय महाविहार था, जहां 10 हजार छात्र रहकर पढ़ाई करते थे। इन छात्रों को पढ़ाने के लिए 2000 शिक्षक थे।