देवव्रत ने अपनी भुजा उठाकर प्रयाण का संकेत किया और उनका रथ सबसे आगे दौड़ चला। रथों के आगे बढ़ते ही, अश्वारोही उनके पीछे-पीछे चल पड़े। ऐसे अवसरों पर सामान्यत: सेना के साथ जो अन्न और वस्त्रों से भरे छकड़े चलते थे- वे इस छोटी-सी सेना के साथ नहीं थे।




हस्तिनापुर नगर गंगा के तट पर था; किन्तु हस्तिनापुर का राज्य मुख्यत: गंगा और यमुना के दोआब के बीच बसा हुआ था। गंगा के दोनों तटों के साथ-साथ आर्यों के प्रमुख नगर बसे हुए थे; इसलिए गंगा का जल उनके पीने, नहाने तथा खेतों को सींचने का ही प्रमुख स्रोत नहीं था, उनकी परिवहन-व्यवस्था भी बहुत कुछ गंगा के जल पर निर्भर करती थी। 



गंगा के कारण ही उनके नगर एक सूत्र में जुड़े हुए थे और आवश्यकता होने पर, स्थल-मार्ग की तुलना में जल-मार्ग से त्वरित यात्रा की जा सकती थी। किन्तु यमुना के साथ अभी उनका इतना गहरा सम्बन्ध नहीं हुआ था। वैसे तो मथुरा जैसा प्रसिद्ध नगर, यमुना के तट पर ही बसा हुआ था; किन्तु उसमें परिवहन अधिक नहीं था। जलचरों की संख्या अधिक होने के कारण उसका जल बहुत सुरक्षित नहीं माना जाता था। यदा-कदा उसमें चलने वाली नौकाएं किसी-न-किसी विपत्ति में फंस जाया करती थीं। 



फिर भी केवटों की विभिन्न जातियां किसी-न-किसी रू प में यमुना से अपनी आजीविका प्राप्त करने का प्रयत्न निरन्तर कर ही रही थीं। यमुना में से मछलियां पकडऩे और नौकाएं चलाने का अधिकांश कार्य ये केवट-जातियां ही करती थीं।




मध्याह्न के आस-पास देवव्रत का रथ यमुना-तट के एक केवट-ग्राम के बाहर रुक गया। उनके रुकते ही अन्य रथ और पीछे आने वाले अश्वारोही भी रुक गये। यमुना-तट पर खेलने वाले कुछ बच्चे और घाटों पर नहाते या कपड़े धोते हुए स्त्री-पुरुष, सैनिकों को देखकर चौंक उठे। 



कुछ क्षण स्तंभित रहने के पश्चात् वे घबराकर ग्राम की ओर भाग गए। नौकाओं में बैठे केवट स्त्री-पुरुषों ने अपनी नौकाएं तटों से हटाकर मध्य धारा में डाल दीं, ताकि सैनिक उन तक न पहुंच सकें।

देवव्रत ने मुस्कराकर सेनापति की ओर देखा, ‘‘इन्हें अभय कर दो सेनापति।’’




सेनापति के संकेत पर एक सैनिक ने उच्च स्वर में घोषणा की, ‘‘ग्राम-प्रमुख, पंच-गण तथा साधारण स्त्री-पुरुष सुनें। यह कोई सैनिक अभियान नहीं है, जिससे किसी को हानि की आशंका हो। यह हर्ष का अवसर है। कुरुओं के युवराज, राजकुमार देवव्रत, अपने एक निजी कार्य से आपके प्रमुख दासराज से मिलने के लिए पधारे हैं। वे सारी प्रजा को अभय दे रहे हैं। प्रजा निद्र्वन्द्व भाव से अपने कार्य में लगी रहे।’’




देवव्रत ने मन्त्री की ओर देखा, ‘‘अमात्य नेतृत्व करें।’’

मन्त्री राजा शान्तनु के साथ यहां आ चुके थे, इसलिए मार्ग से भलीभांति अवगत थे। वे आगे-आगे चले और दासराज के कुटीर के सामने आकर खड़े हो गए।

दासराज ने बाहर निकलकर स्वागत किया, ‘‘पधारें युवराज!’’




‘‘दासराज! मैं एक विशेष प्रयोजन से उपस्थित हुआ हूं।’’ दासराज द्वारा दिए गए आसन पर बैठने के पश्चात् देवव्रत बोले, ‘‘आशा है आप मुझे निराश नहीं करेंगे।’’

‘‘युवराज, आदेश करें।’’

देवव्रत ने वृद्ध दासराज को देखा: उसके चेहरे पर न चिन्ता थी, न भय। वह अत्यन्त निद्र्वन्द्व भाव से बैठा प्रतीक्षा कर रहा था।




‘‘मैं, अपने पिता चक्रवर्ती शान्तनु की रानी बनाने के लिए आपसे आपकी पुत्री देवी सत्यवती की याचना करने आया हूं।’’

‘‘पुत्री है तो उसके लिए याचक भी आएंगे ही।’’ दासराज हंसा, ‘‘वैसे यह मेरा सौभाग्य है कि याचना एक अत्यन्त सम्मानित कुल की ओर से आई है।’’




देवव्रत चुपचाप दासराज की ओर देखते रहे।

थोड़ी देर में दासराज ने सिर उठाकर देवव्रत को देखा, ‘‘यदि मैं कन्या-दान न करू ं तो याचना का स्वरू प क्या होगा- अपहरण?’’

देवव्रत को लगा, अपमान से उनका रोम-रोम सुलग उठा है... अपहरण करना होता तो इतनी याचना की क्या आवश्यकता थी। राजा शान्तनु या देवव्रत के संकेतभर से, कन्या का हरण हो जाता, किन्तु आर्यों की मर्यादा उसकी अनुमति नहीं देती।




दूसरे ही क्षण देवव्रत को लगा... अपमान या क्रोध का कोई प्रसंग नहीं है। दासराज एक साधारण केवट है। बहुत सुशिक्षित भी नहीं है कि समझता हो कि उसके मुख से निकले शब्द किसी के मन में क्या भाव जगाएंगे।... वैसे भी बहुत सम्भव है कि अब तक उसके साथ राजाओं और सैनिकों का यही व्यवहार रहा हो।




...देवव्रत को अपने ऊपर भी कुछ आश्चर्य हुआ। इधर क्या हो गया है कि वे एक ही वस्तु, व्यक्ति या घटना के विषय में दो विरोधी दृष्टिकोणों से सोचने लगे हैं, जैसे वे एक व्यक्ति न हों...या उनके भीतर दो व्यक्ति बैठे हों और दोनों एक-दूसरे के निपट विरोधी ढंग से सोचते हों...

‘‘नहीं! हरण नहीं होगा।’’ देवव्रत बहुत स्पष्ट शब्दों और दृढ़ स्वर में बोले, ‘‘पर आप ऐसा क्यों सोचते हैं, दासराज!’’




‘‘युवराज! मैं अपनी स्थिति को अच्छी तरह जानता हूं।’’ दासराज ने बड़े निर्भीक स्वर में कहा, ‘‘सत्यवती मेरी कन्या है, पर उसकी रक्षा का मेरे पास कोई साधन नहीं है। आप समर्थ हैं। आपके पास सैनिक हैं, शासन-तन्त्र है। आप या राजा शान्तनु उसका हरण करना चाहें तो मैं कैसे रोक सकता हूं।’’