जोधपुर ।

सखी, गर्मी है पानी री जरूरत है, पण पानी भी अपा नै ही बचानो है। हम याद रखें कि किस तरह हमारे बढेरे एक पानी का कई रूपों में उपयोग करते थे। मीलों कोसों दूर सिर पर मटके व चरू में लाया पानी आज नल में से आते ढळ-ढळ पानी को देख वैसी कल्पना भी नहीं कर पाते हैं, पर ये सच है।

 स्नान का पानी तगारी में इक_ा कर कपड़े धोने के काम लेकर वह पानी गारे या गायों के बाड़े में उनकी ठंडक के लिए छिड़का जाता था। उस मितव्ययिता में उन्होंने इस सदी तक के जीवन को जी लिया, लेकिन हमने नल के 50 वर्षों में ही इतना दोहन कर लिया कि आने वाली पीढिय़ां जाने क्या पाएंगी? हो सकता है ये सुंदर दुनिया ही न रहे, और रहे तो बहुत बुरे रूप में। झालरे, कुएं बेरे बावड़ी को कम से कम कूड़ा पात्र तो ना ही बनायें।

भगवान का वास

हम जल देवता वरुण के रूप में परिण्डे में भी भगवान का वास मानते है। जच्चा के जळवा पूजन की महत्ता है। हर षुभ अवसर पर मंगल कळष लाने की परंपरा है। नदी जब आती है तो ढोलण्थाली के साथ पूरा गांव पुष्प गीतों से उसको बधाता है स्वागत करता है खुशी मनाता है। तालाब के आवक की दिशा को साफ -पवित्र रखा जाता है। गांव के अलिखित कानून धरती और वंशजों के लिये हितकारी थे। 

आज हम जीवित हैं 

तभी आज हम जीवित हैं और पानी का भरपूर उपयोग कर रहे हैं। पानी की पहली बूंद कितनी -कितनी खुशियों का संदेश लाती है। हम अकाल की भविष्यवाणी मात्र से कांप उठते हैं। पानी बचाओ के नारे पर अब भी अमल नही किया तो कदैई घी घणा नै कदैई मुट्ठी चिणा वाली बात हो रहेगी ।

पानी सहेजें

आने वाली पीढिय़ों को मुट्ठी चिणा नसीब न होगें। पर सखी ! हम पानी बचाओ के सभी ढब को बरततेहुए हम वॉशिंग मशीन और वातानुकूलित मशीन से निकलने वाला पानी भी सहेजें। कपड़े धोने वाली मशीन कम से कम पानी उपभोग की सेटिंग पर रखें। पहले सर्फ का पानी गटर में न बहाते हुए पोंछा,आंगन और बाथरूम धुलाई में काम में ले। दूसरे को पोंछा के साथ ही गाड़ी और अन्य कामों में ले। तीसरे पानी को मशीन में ही छोड़ दें और कपड़े निचोड़ कर सुखा लें। बचा पानी अगले दिन या दुबारा कपड़े धोने के काम में लें। एसी और पानी साफ करने वाली मशीन से निकला पानी वापिस टंकी में छोड़ें।

जलस्रोत गंदे न करें

अपने पारंपरिक जल स्रोतों की सुध लें और वे गंदे ना करें। नाजर जी का झालरा का पानी जलदाय विभाग वितरित करता है। ये संचरण उसे जीवित कर देगा। वैसे भी भारत में सफ ाई ना करना समस्यानहीं है, बल्कि जनता में सजगता की कमी है जिसके चलते सड़क, सार्वजनिक स्थान आसानी से गंदे करते चले जाते हैं। सफ ाई कर्मचारी के साथ गंदा ना करने की प्रवृत्ति डाल लें तो भी देश की समस्या चुटकियों में हल हो जाएगी। बूंद-बूंद घड़ा भरने वाली बात जन-जन पर भी लागू होती है। हर जोधाणावासी ठान ले तो मुश्किल कुछ भी नहीं। हमारे समय के संवेदनशील राजस्थानी के शीर्ष डिंगल कवि डॉ़ आईदानसिंह भाटी के शब्दों में :

पार पोखरा कुंआ बावड़ी नाडी अर ताळाब राखजै।

पांणी आडी पाळ राखजै थूं जळ री रुखवाळ राखजै ।।